सुप्रीम कोर्ट ने जीवन रक्षक और कैंसर की दवाओं की कीमतों में भारी मुनाफे को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए सख्त टिप्पणी की है। याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने निर्माता कंपनी द्वारा खुदरा विक्रेताओं को बेची जाने वाली कीमत (Price To Retailer या PTR) और अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच भारी अंतर को 'वसूली' और 'खुली लूट' करार दिया। जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने कहा कि यह विसंगति समझ से परे है कि जो दवा निर्माता से 2,700 रुपये में खरीदी जाती है, उस पर 27,000 रुपये का एमआरपी कैसे छापा जा सकता है।
निगरानी अथॉरिटी इस तरह के अंतर पर चुप क्यों?
अदालत ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि मरीज ऐसी व्यवस्था के कारण ठगे जा रहे हैं। जस्टिस मेहता ने कहा कि अगर यह वसूली नहीं है, तो और क्या है। लोग दवाइयां खरीदने के लिए अपने घर और गहने तक बेचने को मजबूर हैं। उन्होंने संबंधित अधिकारियों की चुप्पी पर भी आश्चर्य जताते हुए कहा कि जिन लोगों को इस पर लगाम लगानी चाहिए, वे बिल्कुल चुप बैठे हैं। कोर्ट ने सवाल किया कि जब निर्माता खुदरा विक्रेता को एमआरपी के 10 प्रतिशत हिस्से पर दवा बेच रहा है, तो एमआरपी इतना अधिक तय करने की अनुमति क्यों दी जा रही है और यह भारी असमानता क्यों है।
मूल्य निर्धारण प्रणाली की खामियां
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता किशन चंद जैन और डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ ने दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के मूल्य निर्धारण तंत्र की खामियों को उजागर किया। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर (DPCO) 2013 के तहत केवल 'शेड्यूल' श्रेणी में आने वाली करीब एक हजार दवाओं की ही अधिकतम कीमत तय की जाती है। बाजार की करीब 82 प्रतिशत दवाएं, जो नॉन-शेड्यूल श्रेणी में आती हैं, इस नियंत्रण से बाहर हैं। इन दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने के लिए कोई रेगुलेटरी ढांचा नहीं है। कंपनियां अपनी मर्जी से बेतहाशा शुरुआती कीमत तय कर देती हैं और नियम केवल इतना है कि बाद में वे इस कीमत को सालाना 10 फीसदी से ज्यादा नहीं बढ़ा सकतीं।
दवाओं के कॉम्बिनेशन का अजीब खेल
मूल्य निर्धारण की इस विसंगति को एक उदाहरण से समझाते हुए कोर्ट ने 'रासुवास' नामक एक आम स्टैटिन दवा का जिक्र किया। यह एक नॉन-शेड्यूल दवा है, जिसके एक पत्ते की कीमत करीब 240 रुपये है। लेकिन, जब इसी दवा को एस्पिरिन के साथ मिलाकर बेचा जाता है, तो यह कॉम्बिनेशन 'शेड्यूल' श्रेणी में आ जाता है और इसकी कीमत घटकर 70 रुपये रह जाती है। अदालत ने कहा कि कॉम्बिनेशन वाली दवा तार्किक रूप से ज्यादा महंगी होनी चाहिए, लेकिन यहां व्यवस्था की खामी के कारण उल्टा हो रहा है। इसके अलावा, कॉर्पोरेट अस्पतालों द्वारा मरीजों को अपने ही मेडिकल स्टोर से एमआरपी पर दवा खरीदने के लिए मजबूर करने का मुद्दा भी कोर्ट में उठाया गया, जिससे गरीब मरीजों पर भारी बोझ पड़ता है।
करदाताओं के पैसे की लूट और सरकार का पक्ष
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि इस मुनाफे का सीधा बोझ सरकारी खजाने और करदाताओं पर भी पड़ रहा है। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (आयुष्मान भारत) जैसी योजनाओं के तहत, जो दवा 200 रुपये में आनी चाहिए, अस्पताल उसके लिए 2,000 रुपये का बिल बनाते हैं और सरकार से उसका भुगतान (Reimbursement) लेते हैं। कोर्ट ने इसे प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी का मामला बताया क्योंकि अंततः यह पैसा करदाताओं की जेब से ही जा रहा है।
मामले में केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि सरकार इसे विरोधी नजरिए से नहीं देख रही है और व्यवस्था सुधारने पर विचार करेगी। उन्होंने सस्ती दवाओं के लिए जन औषधि परियोजना का भी हवाला दिया। वहीं, इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने मुनाफाखोरी का ठीकरा खुदरा विक्रेताओं (Retailers) पर फोड़ने की कोशिश की, लेकिन जस्टिस मेहता ने उन्हें तुरंत याद दिलाया कि एमआरपी खुदरा विक्रेता नहीं, बल्कि निर्माता ही तय करते हैं। इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को तय की गई है।

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